Monday, 18 January 2016

मीठी बोली और रंगत पक्षी का आफत बनी




सर पर ताज और लम्बी दुम के बाद जिसके दो लम्बे पंख जो पतले पर अंत में सुंदर रूप लिए, बहुत मीठी आवाज के इस पंछी का नाम भीमराज,या कहीं भृंगराज मिलता है,,जंगल में लहरेदार उड़ान भरते कभी-कभी दिखता है,,इसे अंग्रेजी में [greater racket-tailed drongo] कहते है,,! मुझे इसका जोड़ा मेरे मित्र बजरंग केडिया के भरारी फार्म हॉउस में शनिवार की शाम दिखा,, पहले एक दिखा, उसकी फोटो लिया था की उसका साथी कुछ देर बाद मिला, शाम हो रही थी और बाद दिखा पंछी एक कीड़े को खाने के बाद भांति- भांति की लम्बी सीटी बजा रहा था,कभी दूसरी और से जुगलबंदी होती,, ! मंत्रमुग्ध काफी देर तक सुनता रहा,,!
इस पंछी की सुंदर आवाज और विशेष दुम इसका दुश्मन बनी है,, पर्वतीय हिमालय इलाके की काफी समय पहले एक फिल्म में इसे पालतू कंधे पर बैठा देखा,,बस्तर में इसका बुरी तरह शिकार हुआ, यहाँ आदिवासी युवक इसकी पूंछ के लम्बे दोनों पंख अपनी पगड़ी की शोभा बढ़ने में लगते रहे है,,सुखद है कि ये अब भी बचे हैं, और कभी-कभी दिख जाते हैं,,पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने लिखा है ये पंछी मीठा बोलने वाली दूसरी चिडियों की हुबहू नकल करने में माहिर होता है,,और दुम के सिरे के दोनो अंत में पखों की खास बनावट से इसके उड़ते समय ये भ्रम होता है की दो मधुमक्खी इसका पीछा कर रही हैं,!

Monday, 28 December 2015

अरपा नदी में सुरखाब




''कसर न छोड़ी थी किसी ने, अरपा नदी को बर्बाद करने में,
रब ने रहम कर ''सुरखाब' के दो कंवल अरपा में खिला दिए..
जैसे अरपा नदी में दो कमल खिले हो दो सुरखाब मुझे कार से जल में विचरण करते दिखे, अपूर्व ने कार रोकी और राहुल जी और मैं कैमरे ले कर फोटो लेने जुट गए, तीस बसर बाद सुरखाब का
जोड़ा मुझे दिखा था, मैंने तो मान चला था, शीतकाल के ये में मेहमान परिंदे डिस्टर्ब हो कर विम बिलासपुर,.से विमुख हो चुके हैं.
इनकी रंग सुन्दरता का एक हो उदाहरण 'सुरखाब के पर लगे है क्या,इस मुहावरे से ही जाहिर होता है,,सहित्य से ले कर लोक मिथक में सुरखाब के जिक्र है. अक्सर ये जोडों में दिखते है,, इसलिए इनका नाम भी दोनों साथ भी है जैसे- चकवा-चकवी, गौना-गौनी,चक्रवाक-चक्रवाकी, कोक-कोकी, ये सारे दिन साथ रहते है और रात एक दूजे से अँधेरे में रह रह कर आवाज करते सम्पर्क में रहते है, मान्यता है ये जोड़ा नहीं बदलते,याने एक मरा तो दूजा वियोग में जान दे दे देता है, इसलिए एक नाम वियोगी भी हिंदी थिसारस में मिलाता है,
ये 66 सेमी ऊँची उड़ान भरने वाली बत्तक है जिसका अंग्रेजी नाम है- RUDDY SHELDUCK,
कुछ लेखक इसे प्रवासी मानते है, ये जलीय कीट मछली और सरीसृप खाती है, सामान्य; ये जाड़ो में दिखती है, दूसरी बार में राजेश अग्रवाल राजेश दुआ, दिनेश ठक्कर के साथ फिर इनको देखने गया वो सुरक्षित दूरी पर नदी में तैर रही थी... मेहमान सुरखाब तुम्हारा स्वागत है,,!!

Friday, 11 December 2015

हरम की खोज में आये हाथी को उम्रकैद

"ये कहानी उस युवा हाथी की है जो अपने दल से बिछड़ कर मीलों दूर जंगल से गुजरता हुआ अचानकमार टाइगर रिजर्व इस उम्मीद से पहुंचा,कि यहाँ सिहावल सागर में एलिफेंट कैम्प के हथनी को संगनी बना कर हरम स्थापित कर लेगा, लेकिन उत्पाती हाथी घोषित कर उसे बंदी बना लिया गया है और अब ताउम्र कैद की सजा कटेगा।

ये नर हाथी सोलह साल से बीस साल की उम्र का है ।अचानकमार टाइगर रिजर्व छतीसगढ़ के मुंगेली जिले में बिलासपुर से कोई साठ किमी पर है । अभिलेखों के मुताबिक अविभजित मप्र के अंतिम हाथी मातीन से लोरमी तक बारिश में आते थे । पिछली सदी के दूसरे दशक तक इनकी संख्या तीन सौ थी । बाद ये हाथी कम होते गये ।
लेकिन 1992-93 में बिहार और उड़ीसा से हाथी फिर आने लगे । आपरेशन जम्बो" चला कर सरगुजा में कोई एक दर्जन उपद्रवी हथियो को पकड़ा गया ।


इनमें एक सिविलबहादुर अपने हरम के साथ सिहावल सागर में रखा गया ।इसमें हथनी लाली उनकी बेटी पूर्णिमा और बाद इस पकड़ा गया एक नर हाथी शामिल हो गया ।
हाथी उन विशेष तरंगों से बात करते हैं जो हमें सुनाई नहीं देती, पर मीलों दूर तक इसकी ध्वनि जाती है ।हाथियों की पारिवारिक व्यवस्था में इन्ब्रिडिंग" न हो इसलिए दल से युवा हाथी को खदेड़ दिया जाता है । जो बाद ताकतवर बन किसी दूसरे के हरम पर काबिज हो जाता है ।


हाँ तो हमारा ये युवा हाथी मीलों का रास्ता जंगल पहाड़ तय करता हुआ टाइगर रिजर्व पहुंच गया।और उसने अपने मौलिक ज्ञान से यह भी पता लगा लिया कि पालतू हो चुके हाथी कहाँ रहते है। कठिन राह में उसने उत्पात भीं किया। जिस वजह' लाली या 'पूर्णिमा के लिए आया ये हाथी बेहोश कर पकड़ लिया गया।
इस बीच युवा होने से पहले पूर्णिमा की मौत हो गई हैं जिसके कारण को जाँच हो रही है ।पता चला है पूर्णिमा की माँ लाली बीमार और कमजोर चल रही है । 


सैकड़ों किमी का , लम्बा सफर, हरम की खोज बाद इस आशिक की नियति में अब जीवन भर गुलामीलिखी है ।जिसमें उसे साधने के लिए इस हाथी को जटिल दुखद प्रकिया से गुजरना होगा ।
( फोटो- पत्रकार अमित मिश्रा की वाल से साभार)

Wednesday, 18 November 2015

ब्लैक ड्रेंगो ने वल्चर को खदेड़ा .




छोटी चिड़िया ब्लैक ड्रेंगो के हौसले से घुसपैठी सफेद गिद्ध को इलाके से खदेड़ा-

काली हल्की-फुलकी भुजंगा [ब्लैक ड्रेंगो] के इलाके में दुर्लभ सफेद गिद्ध धूप का सेवन कर रहा था, तभी उसकी घुसपैठ पर ब्लैक ड्रेंगो ने हमला बोल दिया,बिलासपुर शहर के करीब उसलापुर स्टेशन के पास में कल सुबह इस गिद्ध की फोटो ले रहा था, तभी ये मंजर मुझे दिखा, उड़ कर बार बार ब्लैक ड्रेंगो उसके सर पर झपटी मरता और सफेद गिद्ध बचाव में सर झुका लेता.!

ब्लैक ड्रेंगो 26 सेमी का और सफ़ेद गिद्ध 65 सेमी का वजन में उससे चार गुना अधिक पर ब्लैक ड्रेंगो के सामने वो बचाव की मुद्रा में रहा, मैंने दूरी की फोटो लीं और जब मन भर गया.. दोनों को उनके हाल पर छोड़ आगे बढ़ गया करीब , अपनी एक दिन की इस उपलब्धि से खुश था. इसलिए जल्दी वापसी तय कर दस मिनट बाद जब लौटा तो देखा दूर सफेद गिद्ध उड़ा जा रहा है और ब्लैक ड्रेंगो पीछे इलाके से खदेड़ने में पीछे उड़ती जा रही है..! ये अब मेरे कैमरे के रेंज से दूर था! 

बहादुर ब्लैक ड्रेंगो को चिड़ियों का कोतवाल कहा जाता है, जहाँ ये घोंसला बनाती है वहां कमजोर दूसरी चिड़िया भी बस जाती हैं यदि कोई शिकारी पक्षी उधर आया तो ब्लैक ड्रेंगो उसकी खूब खबर लेती है,,,!

Sunday, 2 August 2015

सिलिकान वेली मिली


 अचानकमार टाइगर रिजर्व से अमरकंटक की राह बंद करने की तैयारी है, इसके लिए रतनपुर केंदा केवंची या पेंड्रा होते हुए अमरकंटक जाने का रास्ता रहेगा,काफी बन चुका है और घाट का काम 'विलंबित' गति से चल रहा है,पेंड्रा से पहले इस घाट की चट्टानों को काटा गया है और इसके साथ 'सिलिकान वेली' प्रकट हो गई है ,,! 

इस बार बिलासपुर से अमरकंटक जाने के लिए इस रास्ते को चुना था, जब कार इस घाट के कच्चे रस्ते को पार कर रही थी तो नवभारत के पूर्व सम्पादक बजरंग केडिया की नजर चांदी-सोना से मिली चमकती इस पहाड़ी चट्टानों पर पड़ी, बच्चन सिंह ने कार रोकी, और मैंने कुछ फोटो लीं, अमरकंटक के इलाके में बाक्साइट की खान रही है.. और 'अबरक' भी सड़क पर बिखरा हुआ मिलता रहा है.. पर इस निर्माणाधीन राह में तो चमकीली अबरक [सिलिकान] की दूर तक चट्टानें बड़ी मोहक है..! ये चट्टानें किस वजह चमक रही है इसकी अंतिम पुष्टि बाकी है..! 

एक बात और राह तो ठीक बनी है.. पर इस घाट में जिस विलंबित गति दे काम हो रहा है. नहीं लगता की नवम्बर तक ये घाट बन पायेगा और 'अचानकमार टाइगर रिजर्व' की पांच बेरियर वाली राह बंद हो पायेगी ,,!
[फोटो पर क्लिक करके इस बड़े स्वरूप में देखिएगा ..!


Tuesday, 7 July 2015

वनस्पति और जीव एक दूजे के लिए



विश्व में एक दूजे के लिए कुदरत ने जो बनाया है.. उसे समझने एक जीवन छोटा लगने लगा है, कल सुबह अपने फ़ार्म हॉउस गाँव मंगला  में मुझे 'एक दूजे के लिए' की एक नई जोड़ी से परिचय हुआ,,आप देखी, आप के साथ ,,,! कैसे वनस्पति और जीव एक दूसरे के लिए बने है ..

रात रानी रात खिली और सुबह कोई अनजान पतंगा, उसके फूलों का रस चूसने पहुंचा, न वो भौंरा था और न वो तितली, करीब ढाई इंच लम्बा, और एक इंच के पंखों का जोड़ा, छोटे पंख और भारी शरीर कहीं से वो उड़ने के काबिल नहीं.. कम से कम वायुगातिका के नियम से,,पर गजब की उड़न वो इन पंखों से आगे-दांये-बायें नहीं पीछे भी उड़ता और सामने छोटे से अंग से वो रातरानी के फूल के भीतर से कुछ रस लेता जाता,,! कोई आधे घंटे तक वो बिना रुके फूल-फूल तक उड़ता रहा..!

एक मिनट में बीस जगह कम से कम, फूलों तक जाता पंख का कुशल संचालन और गति इंतनी की दिखाई न दे,,कैमरे की गति कम पड़ गई ,,! फिर रंग भी रातरानी के रंग से मिलता जुलता हरा.. फोटो जो ली वो आपके समक्ष हैं, दोस्तों आप में कोई कीट वैज्ञानिक हो या इस खूबसूरत कीट के नाम से परिचित हो तो जरूर बतायें ..!!

Monday, 22 June 2015

गिद्धों को बचना होगा

'ऊँचे आकाश पर उड़ान भरने वाले गिद्धओं को जू के पिंजरे में देख ये आशंका होना स्वाभाविक है कि दुर्लभ्य जीवों का अंतिम आशियाना क्या चिड़ियाघर ही होगा,,कम होते परिंदों को बचाने के लिए अब सभी जिलों में 'जिले का' एक पक्षी घोषित कर उसकी उसका संरक्षण जरूरी है. छ्तीसगढ़ के बिलासपुर के जू कानन पेंडारी में ये गिद्ध खुडिया; और लोरमी" के इलाके से कोई दो साल के दौरान लाये गये हैं, ये मुगेंली जिले में हैं, जहाँ और कुछ गिद्ध बताये जाते हैं ,,!!
लगभग 90 सेमी ऊँचे और मजबूत गिद्ध सफाई कर्मी है ,पर दो दशक में हुए ये दिखाना कम हो गए,बताया जाता है दुधारू मवेशियों को अधिक दूध देने लिए हार्मोन्स के इजेक्शन दिए जाते और फिर इन मवेशिओं के मरने के बाद गिद्ध ने उसे अपनी खुराक बना लेते.. जिस वजह इन हार्मोन्स के बचे असर से गिद्धों के अंडे से बच्चे नहीं निकते,गिद्ध काफी ऊँचे पड़े पर घोंसला बनते है.. अब ऊँचे और मजबूत पेड़ कम हो चले ! आज कम ही लोगो को याद है कि अंतिम बार गिद्ध कब देखा है ,,!!

जू में गिद्ध को चाल और सुन्दरता देखते बनती है,,कुछ दिनों हुए अचानकमार टाइगर रिजर्व का दफ्तर मुंगेली जिले के लोरमी में शुरू हुआ. बाघ और गिद्ध का नाता है, बाघ शिकार खाने के बाद जो बचा छोड़ जाता है वो गिद्धों का भोजन होता है ,,इस तरह उनकी इस सफाई कर्म से जंगल में वन्यजीवों में बीमारी नहीं फैलाती ..
आज वक्त है इस शानदार जटायू को बचाएँ कल फिर वक्त न होगा ,,