Wednesday, 29 May 2013

बाघ गणना में गए और भटक गए



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बाघ की गणना जान का जोखिम है, ये नहीं कि जंगल में बाघ हमला कर देगा, अपितु घने जंगल राह भटक सकते हैं. पांच साल पहले बाघों की गणना उसके दरी पगचिन्ह देख कर की जाती थी तब न तो जीपीएस का उपयोग होता था और न ही कैमरे से बाघ की फोटो की तकनीक की वैज्ञानिक पद्धति ही विकसित हुई थी . हाँ, वनविभाग बाघों की गणना में ‘नेचर’ से जुड़ी संस्थाओं की मदद लेता ज़रूर रहा .
वो मई के शुरुवाती दिन थे इसलिए मैं सुबह अचानकमार सेंचुरी के सरहदी इलाके में सिहावल सागर सुबह-सुबह इस गणना में  पहुँच गया था, इस जलाशय से मनियारी नदी निकलती है. मेरे साथ पत्रकार दिनेश ठक्कर और शरद पाण्डेय थे. इस जलाशय में मगर हैं . घने साल वन के बीच इस सुंदर जलाशय में संध्या होने के पहले आज भी बायसन का झुण्ड पानी पीने पहुँच जाता है. मेरा अनुमान था कि, जलाशय के किनारे कीचड़ में बाघ के पदचिन्ह जरूर मिलेंगे. अभी ये सोच ही रहे थे की मेरा जांबाज दोस्त अर्जुन भोजवानी पहुंचा. वो कुछ उत्तेजित लग रहा रहा था.मैंने पूछा तब उसने बताया कि बाघ के पदचिन्ह खोजते हुए ऐसी जगह पहुँच गया जहाँ अवैध लकड़ी कटाई हो रही थी, मना करने पर लकड़ी काटने वालों ने हमला दिया, जान बचाने पिस्टल से तीन गोली चलानी पड़ी है .

  हम सबने तय किया चलो कटाई करने वालों को सबक सिखाया जाए .इस इलाके में पिछले साल बाघों की गणना के लिए मैं  पीसीसीएफ [वन्यप्राणी] के था जिप्सी से आया था तभी राह में एक दर्जन ग्रामीणों ने सड़क पार की, सबके कंधे पर कुल्हाड़ा था. मैंने साथ सफर कर रहे वनकर्मियों से उनको रोकने के लिए कहा और पूछा- ये कुल्हाड़ी क्यों ..? जवाब मिला जंगल में रक्षा के लिए. मैंने फिर पूछा, सबके पास और भारी लकड़ी कटाने वाली ही क्यों..? अब वो भागने लगे. पीछे के गाड़ी से दो-वन कर्मी उनको खदेड़ने थोड़ी दूर गया फिर वापस आ गए. शायद वे  जानते थे आगे जान खतरे में पढ़ जाएगी .मुझे बीते साल की ये घटना याद आ गई. बहरहाल दो जीपों में हम लोग रवाना हुए.

करीब जीपें दो किलो मीटर बाद रुक गई आगे की राह दुर्गम थी और चढ़ाई पैदल तय करनी थी. कुछ दूर जाने के बाद दिनेश ठक्कर और डा.मोटवानी ने कहा हम जीप के लिए वापस जा रहे है वहां इंतजार करेंगे . बीटगार्ड साहू ,अर्जुन भोजवानी ,शरद पाण्डेय और मैं आगे बढ़ गये. तीन किलोमीटर के बाद भी कोई न दिखा और न पेड़ कटे मिले..न कटाई की आवाज ,पर अर्जुन के कहने से आगे बढ़े जा रहे थे .आखिर मैंने कहा- अर्जुन हम जंगल में  जितनी दूर आ गए हैं वहाँ से तो वापस जाना ही मुमकिन नहीं लगता. सबको बात सही लगी और फिर जारी हुआ वापसी के लिए जद्दोजहद का सिलसिला ,कभी सूरज को आधार मान के आगे बढ़ाते तो कभी नाले-नाले चले जाते तो किसी पगडण्डी पर चलने लगते .पानी की एक बोतल थी. वो भी धीरे-धीरे ख़त्म हो गई. भूख लगाने लगी तो तेंदू के कुछ फल गिरे मिले कुछ तोड़े पर ये ऊंट के मुंह में जीरा सा था 

..कभी खाई फिर पहाड़ दर पहाड़  पग-पग तय करते गए. साथ गया बीट गार्ड नया था, जब राह न मिलती तो हम अपनी हताशा उस पर उतारते तो वो बोलता ‘भाई मरना है तो मार लो’ मैं भी ये जगह नहीं जानता’’ .. तय हुआ ऊँचे पहाड़ से किसी गाँव को देखें ..दोपहर ढलने लगी पर सूरज तप रहा था. किसी तरह पहाड़ पर चढ़ गए ,पर कोई गाँव दूर-दूर तक नजर नहीं आया. लेकिन मोबाइल पर हल्का सा कवरेज़ दिखा ..जंगल में मदद की लिए किसी को मोबाईल पर बात करना संभव न था लिहाजा बिलासपुर में अपने भटक जाने की खबर वन विभाग को दी और संभावित जगह बताई जहाँ हम लोग होंगे.

वन विभाग ने वायरलेस मेसेज अचानकमार में मौजूद आधिकरिओं को दिया और दो- तीन गाड़ियाँ हमें खोजने निकलीं. हम भी प्यासे चले जा रहे थे ,राह में एक नाले में जगह-जगह रुका थोड़ा पानी दिखा,पत्तों का दोना बना पानी पिया,खाली बोतल भी इसी पानी से भर ली. फिर मैं पानी पीने झुका और शर्ट की जब में रखा मोबाइल पानी में गिर गया. गंदले पानी से खोज कर निकला पर वो बंद हो चुका था. इसी नाले पर आगे बढ़ाते रहे, बाघ के पदचिन्ह खोजना भूल चुके थे. मेरे जूते का सोल उखड़ गया था .कुछ देर ठंडी छांव में बैठ ताकत बंटोर चलाते रहे.

शाम हो चली चली थी, तभी किस्मत से  कालेज का एक छात्र नाले में वनकर्मी के साथ दिखा जो बाघ के पदचिन्ह खोजने आया था. वन कर्मी अनुभवी था. उसे जंगल की राहों का पता था. वो हमें सड़क की और ले आया..वो न मिलाता तो न जाने क्या होता. कुछ देर बाद हमें खोजने निकला दल भी इस राह से गुजरा उसने पस्त हो गये हमें पानी और कुछ खाने का सामना दिया. जान बची और लाखों पाए...! हम सिहावल सागर से मीलों दूर निकल चुके थे..बाद छपरवा पहुंचे जहाँ हमारी प्रतीक्षा हो रही थी..!
 एक बात और जंगल में कोई वन्य जीव तो न दिखा पर, ये भटकाव यादगार बन गया. रेस्ट हॉउस में मैंने एक वन अधिकारी वनकर्मी को डांट रहा था. ‘’साले तुम लोग पहले गाँवों  में जा कर क्यों नहीं बताते कि बाघों के गणना होगी लकड़ी काटने जंगल मत आना ..!” 

Wednesday, 24 April 2013

आदमखोर बाघनी का रेंज अफसर खोखर ने किया शिकार


अचानकमार टाइगर रिजर्व में अचानकमार-विन्दावल गाँव के बीच सड़क के किनारे इस स्मारक में लिखा है.-यहाँ मैकू गोंड़ फायरवाचर को आदमखोर शेरनी [बाघनी] ने 10-4-1949 को मारा था,जिसे तारीख 13-4-49 को एम् डब्लू के खोखर रेंज अफसर कोटा ने 'मरी' पर बैठ के गोली से मारा...आज भी ये इलाका बाघ का है. पर इन दोनों गाँव में बहुतेरों को बाघनी के मैकू को मरने और फिर उसे खोखर साहब द्वारा मचान से गोली मरे जाने की कहानी आज भी जुबानी है.
 शिकार की इस दास्ताँ को शिकारी वहीद खान खोखर ने अपने अन्य अनुभव के साथ किताब में लिखा था. जिस अविकल मेरे पत्रकार मित्र राजू तिवारी ने अपने प्रकाशन में नया कलेवर दिया है. कुछ माह पहले मैं मित्र डा.चन्द्रशेखर राहालकर,और लखनऊ ने आये लेखक मोहन सर के साथ विन्दावल गाँव पहुंचा था. इस बाघनी के विषय में बताया गया कि उसके खौफ से गाँव में रहना कठिन हो चला था.ये इलाका बिलासपुर से अमरकंटक की सड़क पर पड़ता है.

बाघनी दवारा मैकू का शिकार –-> उन दिनों आदमखोर बाघनी एक के बाद एक आदमी मार रही थी.फायर वाचर मैकू  अपने फायरवाचर साथी परसादी के साथ सड़क के किनारे सूखे पत्ते हटा रहा था.बाघनी करीब दीमक की  बाम्बी [छोटे से टीले ] के पीछे घात लगा कर छिपी थी. उसने परसादी के सिर के ऊपर  से छलांग लगाते हुए मैकू को गर्दन से पकड़ कर एक झटके में  ही गर्दन तोड़ दी,फिर वो परसादी पर झपटी लेकिन वो कुछ  दूर निकल गया था ,.वापस आकर बाघनी ने मैकू! को घसीट कर जंगल में ले गई .

बाघनी का रेंज अफसर दवारा शिकार--->रेंज अफसर वहीद खान खोखर को जब ये पता चला तो वो पांच सौ बोर की राइफल  और बारह बोर की गन के कर कोटा से मौके पर  पहुंचे.लेकिन बाघनी को मारने की योजना जो बनाई जाती वो कामयाब न होती,खौफजदा हो कर एक स्थनीय शिकारी भी साथ छोडकर चला गया. तब मैकू की काफी खाई लाश को पेड़ से बांध कर [ताकि बाघनी खींच कर न ले जा सके] करीब के पेड़ पर मचान बनाया गया .उनके साथ धनुआ पनका पैसे व इनाम के प्रलोभन लिय  मचान में बैठ गया. मचान. मचान 18 फिट की ऊंचाई पर बंधी गई थी , बाघनी मैकू की बची लाश को खाने दबे पाँव आई. कुछ लम्हे बाद मचान से रौशनी के साथ गोली चली और घायल हो के  बाघनी जंगल भाग निकली .सुबह होने पर कुछ दूर ही  झाड़ियों में वह  मरी हुई मिली ,उसे मरा देख  वनवासियों में जश्न मनाया. ये बाघनी और भी लोगों को अपना शिकार बना चुकी थी.

आदमखोर होने का कारण—>बाघनी के अगले पंजे में कभी गोली लगी थी ,घाव तो भर गया था पर इस  वजह वो फुर्तीले जंगली जानवर पकड़ने में असमर्थ हो गई परन्तु  मनुष्य  सहज पकड़ने की वजह आदमखोर हो गई थी .इस शिकार के बाद खोखर को पुरस्कृत किया गया और इस स्मारक को बनाये जाने की अनुमति दी गई.
फेक्ट फ़ाइल्-->
1. मैकू हट्टा-कट्टा ,अविवाहित जवान था. शिकार के बाद बाघनी एक से अधिक बार उसे खाने आई.
2. कुछ बाघों का शिकार कर चुके गवारु पंडित की हिम्मत जबाव दे गई थी और उसने इसके शिकार में खोखर साहब का साथ देने से इंकार कर दिया था.
3.गोली पांच सौ बोर की राइफल से चलाई गई थी. इस बघानी को पहले कभी एलजी का छर्रा अगले  पंजे में लगा था .घाव तो भर गया था,पर ये पैर कमजोर हो गया था.
4. बघानी 9 फिट लम्बी थी..बाघ को पूंछ से नाक तक की लम्बाई में नापा जाता है.

जंगल का फूल बगिया की रौनक


 बचपन की याद बड़े होने तक बनी रहती है ,बशर्ते कोई खास बात हो.  मेरे पिताजी सीएल चड्डा ने  घर की बगिया में कलिहारी के पौधे को लगाया था. हर साल कंद से पौधा बरसात में फूट पड़ता और जाती बरसात में पीले फूल पर लाल रंग लिए अजब पंखुडिया वाले कुछ फूल खिलते.लड़कपन  में देखे इस सुंदर फूल की याद बनी रही.,,वर्षो बाद एक दिन मैं अपनी पुत्री प्रिया  महाडिक के साथ जंगल की छोटी सी  पहाड़ी पर चला रहा था. तभी इसका एक नन्हा सा पौधा दिखा,.पत्तियों की खूबी के कारण मैं उसे पहचान गया.फिर क्या था ,कार से टायर बदलने के कुछ औजारों से प्रिया ने उसे खोद का निकल लिया..अब  तीन सालों हर साल ये फूल हमारी बगिया की शोभा बढ़ने जाती हुई  बरसात में खिल जाता  है.बेलनुमा ये पौधा पत्तियों की घुमावदार नोक से आस-पास किसी सहारे को लेते हुए ऊपर बढ़ता है ,और चार-पांच फिट की ऊंचाई पर इसके मोहक फूल आने लगते हैं.फूल तो दस-बारह आते हैं पर बगिया में बहार आ जाती  है.
इसका वानस्पतिक नाम gloriosa superba है .औषधीय गुणों के अब  इसके प्राकृतिक रूप से मिलने में दिक्कत आने लगी है.संस्कृत में इसका नाम अग्निशिखा है . पीली पंखुडियो पर सुर्ख लाल के कारण ये नाम इस दिया था है.  फूल करीब दस दिन तक रहता है और अंतिम दिनों लाल राग का हो जाता है.जंगल से एकत्र कर इसके निर्यात पर प्रतिबन्ध लग है.'गठिया वात ,जटिल प्रसव,में या उपयोगी है,बालुई-पथरीली भूमि के इसकी खेती की जा सकती है..वर्षा में उगने और वर्षा में ही तैयार होने के कारण इसमें सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती .

Tuesday, 23 April 2013

अमरकंटक घाटी के सदा हरे-भरे वन

अचानकमार टाइगर रिजर्व और अमरकंटक घाटी के सदा हरे  साल के वनों पर साल बोरर का हमला बीती सदी के अंतिम दशक में हुआ,तब अविभाजित मध्यप्रदेश का कान्हा नेशनल पार्क भी इससे बच न सका .कान्हा के फील्ड डायरेक्टर राजेश गोपाल थे .एक छोटे तथा जीवट बोबर न मजबूत साल के पेड़ों को सूखा  दिया , इससे बचने के लिए बोरर प्रभावित लाखों पेड़ो को काटा गया .

इन सबके बावजूद साल का जंगल आज भी घना है. जिसकी हरियाली आँखों को सकूँ देती है. अचानकमार टाइगर रिजर्व के इलाके में आने वाले एक वन को दियाबार कहा जाता है. यहाँ पेड़ इतने घने थे कि धूप जमीन तक सीधी नहीं पहुँचती. [दिया जला के जाना होता है ] .आज भी साल के यहाँ घने और मजबूत पेड़ है,. इसे बाघ का इलाका माना जाता है. बीस साल पहले बंगाल से आये सैलानियों की मेजबानी मैं और पत्रकार अमित मिश्रा कर रहे थे ,खुली जीप मैं  चला रहा था. तभी  दियाबार जाने से पहले मुख्य सड़क पर दिन को बाघ बैठे सबने देखा . पेड़ पर बंदर किटकिटा कर खतरे की सूचना दे रहे थे . जब जंगल इतना घना और नैसर्गिक होगा तो बाघ और दूसरे वन्यजीव कैसे न होंगे. पर बदलते समय में उनको और अधिक सुरक्षा की जरूरत है.

3055 रूपये में बना बंगला सौ साल से खड़ा



कोई मानेगा कि जंगल में दो कमरे ,बीच भोजन कक्ष का आलीशान बंगला मात्र  तीन हजार में बना होगा.नहीं न पर ये सच है,आज से सौ साल पहले ये डाकबंगला 3055रु. 8आना 5पैसे[पाई]की लागत से बना है,ये डाकबंगला बिलासपुर-अमरकंटक सड़क मार्ग में 85 किलो मीटर दूर गाँव लमनी में खड़ा है. ब्रिटीश वास्तुशिल्प से निर्मित इस डाक बंगले का निर्माण जून 1913 में हुआ था.ये इस बंगले का शताब्दी साल है, जून में सौ साल पूरे होने हैं . सौ साल से ये सुंदर बंगला आज भी जवान है. यहाँ रुकने वाले ने सौ साल तक अमरकंटक की घाटी की शीतल हवा का गर्मी के ऋतु में भी उठाया.मगर वन्यजीवों को बचाने सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए अचानकमार टाइगर रिजर्व के इस सरहदी डाक बंगले में रात्रि आवास प्रतिबंधित कर दिया गया. [ऊपर की फोटो- डाक बंगला ,नीचे  डाक बंगले का ब्यौरा.]

Monday, 22 April 2013

छतीसगढ़ के जंगल में बिग- फाइव खतरे के क्रम में







छतीसगढ़ के जंगल में फाइव-बिग को खतरे क्रम से लिखा जाए तो – वनभैंसा, बाघ,बाईसन,तेंदुआ और हाथी...,हाथी तीन दशक पहले तक इन जंगलों में नहीं थे मगर, झारखंड,उड़ीसा,बिहार से पहुंचे और अब ये यहीं के हो कर रह गए हैं .
वनभैंसा [babualus arnee] छत्तीसगढ़ का राजकीय पशु है, मगर ये उदंती में एक मादा और सात नर बचे हैं. इन्द्रावती राष्ट्रीय उद्यान में इनकी मौजूदगी है,WTI के राजेन्द्र प्रसाद  मिश्रा ने कुछ समय पहले वहां दौरा करके ये बात कही. बस्तर के शरद वर्मा भैंसे की कम होती संख्या पर चिंता जाहिर करते रहे हैं.ये इलाका नक्सल प्रभावित है और वन आधिकारी इनकी सही गिनती करने में असमर्थ हैं. सरकारी आकड़ा कहता है इनकी संख्या सौ से अधिक है,पर गैरसरकारी जानकार  इसका आधा भी नहीं मानते.
बाघ[pantbera tigris] छतीसगढ़ राज्य निर्माण के अवसर पर अविभजित मप्र में 927 बाघ थे जिसमें
छतीसगढ़ में दो सौ बाघ थे.तब गिनती पदचिन्हों के आधार पर होती थी. आज और सही तरीके उपलब्ध है.इसके मुताबिक बाघ 20 से 30 ही रह गये हैं. मगर इनकी संख्या बढ़ने की संभावना बनी है.क्योकि वन विभाग की नींद खुल गई है.
बाइसन[bos gaurteus] को मैं खतरे से बाहर मानता हूं,इस विशालकाय जीव का शिकार बाघ के बूते की बात है,और उनकी गिनती कम हो गई है.तेंदुआ इनके बिछड़े शावक को भले शिकार बना ले पर झूंड की सुरक्षा में वो इनपर हमला नहीं करता. मेरे बिग फाइव में ये सब से सुलभ और शांत देखे जाने वाले  वन्य जीव हैं.
तेंदुआ.[pantbera pardus] ये तो जंगल का राजकुमार है.चपल और तेज तेंदुआ जंगल से लेकर वन्य गाँव तक तेंदुआ अपनी मौजूदगी बताता  रहता है.छतीसगढ़ के जंगल में इसका देखा जाना कोई अनोखी बात नहीं..!
हाथी [elephas maximus] मान न मान मैं तेरा मेहमान बनकर हाथी 'बिग- फाइव'[बी] का सबसे बड़ा और सुरक्षित जीव बन गया है. मानव और हाथियों का बीच जमीन के लिए जंग छिड़ी हुई है.हाथियों के लिए सेंचुरी बनाई जाना प्रस्तावित है, पर उनको सीमा में बांध पाना संभव नहीं लगता. हाथी और आदमी को साथ रहना सीखना होगा.ये कुदरती प्रक्रिया चल रही है.[फोटो-एक मेरी शेष गूगल ]

Sunday, 21 April 2013

न कटे जंगल, यदि वनवासी साथ न दें

जंगल को अपनों की विवशता से खतरा '' 
'शाही आदेश से सूफी फ़क़ीर पत्थर मारे जा रहे रहे थे,फ़क़ीर मौन खड़ा चोटों को झेल रहा था. पत्थर मारने वाली भीड़ में फकीर का चेला भी था, वो डर गया सोचा मैंने पत्थर न मारा तो बादशाह नाराज हो जायगा. तो फिर दिखाने के लिए उसने एक फूल फ़क़ीर को फेंक के मारा. फ़क़ीर दर्द से चीख पड़ा- सजा पूरी होने के बाद चेले ने फ़क़ीर से पूछा, ‘’मैंने तो फूल मारा था, आप चीख पड़े,जहाँ फूल लगा वहां से तो खून निकल आया. ऐसा क्यों ? फ़क़ीर ने कहा, ‘जो मुझे पत्थर मार रहे थे वो नहीं जानते थे की मैं बेगुनाह हूँ ,तू अपना था और जानता था में बेगुनाह हूँ, इसलिए तेरे फूल ने मुझे पत्थर की मार से ज्यादा आघात पंहुचा..!
दंतकथा है-‘बांस ने लोहे का साथ कुल्हाड़ी का दस्ता बनकर दिया और इस वजह जंगल की कटाई शुरू हो सकी ,अकेला लोहा कभी पेड़ न काट सकता.’ तब से बांस पूजित न रहा. पीछे दिनों मैं गहन जंगल में था. मैंने देखा पेड़ों की कटाई के बाद उसके परिवहन के लिए रस्सी का नहीं अपितु उससे मजबूत मोलायाइन डोर [जंगल की बेल जिसके पत्ते का पत्तल-दोना बनता है] का उपयोग किया जा रहा था. सही है जब तक कोई अपना न मिले दुश्मन बाल-बांका नहीं कर सकता.

यदि जंगल में आश्रय पाने वाले अधिकांश आदिवासी जंगल कटाने या लकड़ी निकलने का काम करने में लगे हैं. यदि कटाई कम होगी  तो जंगल की वनोपज उनका सहारा अधिक दिनों तक बनी रहेगी ,ये जंगल के वन्यजीवों के लिए भी लाभदायक होगा. मगर आज रोजगार अवसर जंगल काम हैं,वनवासी दीगर कार्यों में कुशल न होने के कारण वे कटाई जैसे  काम, कम दिहाड़ी पर भी करने  विवश हैं.जब तक ये कुटीर उद्योगों से नहीं जुड़ जाते अवैध जंगल कटाई करने वालों के प्रलोभन में आते रहेंगे .