Thursday, 8 August 2013

काली हल्दी, अमरकंटक की घाटी में


अमरकंटक की घाटी में न जाने कौन-कौन सी वनौषधि आज भी अपारिचित हैं. शिवरात्रि के वक्त जब यहाँ मेला लगता है, तब बैगा आदिवासी मेले में भांति-भांति के जड़ी-बूटी ले कर विक्रय के लिए पहुँचते है. मैं जब अपने पिताजी के साथ बचपन में अमरकंटक जाता तब इन जड़ी-बूटियों को हैरत से देखता..वक्त गुजरता गया..! बिलासपुर के माटी पुत्र राजनीतिक और साहित्यकार श्रीकांत वर्माजी के देहावसान बाद उनकी धर्मपत्नी श्रीमती वीणा वर्मा राज्यसभा की सदस्य बनी, उन्होंने सांसद निधि को बिलासपुर के विकास कार्यो में लगाना शुरू किया..बीआर यादव मप्र के वन मंत्री थे..सन 1994-1995 की बात होगी, श्री यादव ने मुझे कहा-वीणाजी अमरकंटक देखना चाहती है. आप साथ चले जाएँ. बस फिर अगले दिन वीणाजी मैं और मेरी बेटी प्रिया और रामबाबू सोंथालियाजी का सुपुत्र मोनू कार से निकल पड़े..!

अमरकंटक की बिलासपुर से दूरी 125 किमी है, ये रास्ता अचानकमार सेंचुरी [अब टाइगर रिजर्व]  से हो कर गुजरता है. श्रीमती वीणा वर्माजी से मेरा रिश्ता भाई-बहन का है. मैंने बताया कि जिस राह से गुजर रहे हैं, वो बैगा बाहुल्य हैं, उनकी इच्छा प्रकट की किसी बैगा गाँव को देखा जाये, राह में लमनी पड़ा, इस गाँव से मैं परिचित था. वहां रुके तो वनकर्मी भी साथ हो लिए, गाँव का मुखिया हमें गाँव दिखने ले चला. मिट्टी से बने घर, छत खपरों का, बैगा जनजाति श्रृंगार प्रिय होती है, महिलाओं का गोदना, गले में लाल छोटे मोतियों की ढेर सी माला, देख वो दंग रह गई. तब बैगा पुरुष भी सिर पर बाल रखते थे. गाँव काफी दूर तक फैला है.

बैगा जड़ी-बूटी की चिकित्सा का ज्ञान रखते हैं. मैंनें वीणाजी को बताया कि अमरकंटक की इस घाटी में कभी काली हल्दी मिलती थी पर कभी देखी नहीं है. गाँव का मुखिया अपने घर ले आया और चारपाई बिछा कर बैठाया, कुछ देर बाद वो कुदाल लाया और आंगन में केले के पेड़ के नीचे से कोई ‘जड़ी’ खोद लाया..गाढ़ा नीला-काला द्रव उससे निकल रहा था. अक्टूबर-नवम्बर चल रहा होगा..हल्दी की गांठ बन गई रही..सुंगध से समझ आ गया कि यही काली हल्दी है.उसके पत्ते सूख चुके थे, मुखिया ने दो गांठ काली हल्दी की हमें दी, हमने जब पैसा पूछा तो उसने लेने से इंकार कर दिया.

काली हल्दी के गांठ वीणा जी अपने साथ दिल्ली ले गई, मैंने घर आकर एक में लगा दिया,पहली बरसात के साथ उसके पीके फूट पड़े और हर साल में उसे बढ़ते गया, आज मेरे घर और फार्म हॉउस में काली हल्दी काफी उगी है. इसके पत्तों में हल्दी सी खुशबू होती है, पर पत्तों के मध्य काली पट्टी होती है..इसे कृष्णा हरिद्रा भी कहते हैं, आम हल्दी की भांति से सेवन नही किया जाता, पर बताया जाता है कि इसमें मजबूत एन्टीबायोटिक गुण होते है. कुछ तंत्र-मन्त्र को मानाने वाले इसे खोजते मिलते हैं ..! अमरकंटक के पहाड़ों पर ये यदाकदा दिखाती है तो लगता है कि कभी दुर्लभ काली हल्दी आज लुप्त होने के खतरे में नहीं..!

Friday, 28 June 2013

वन्यगाँव में कुपोषण और कमजोर पशुधन



पशुधन विकास के लिए चलाई गई योजना किसी प्रदेश की ग्रामीण आर्थिकी के सफलता असफलता को बताती है, इसलिए ही पशुधन शब्द का उदय हुआ होगा. मैंने ये निरंतर महसूस कर रहा हूँ की छतीसगढ़ के गाँव में पशुधन कमजोर होता जा रहा है, वैसे वो पहले भी कमजोर था. अगर पशुधन कमजोर रहा तो जंगल में आदिवासी- और ग्रामीण बच्चे कुपोषित रहेंगे.

सन 1972 के आसपास कालेज टूर में हम छात्र प्राचार्य रामनारायण शुक्लजी के साथ कश्मीर गए थे, श्रीनगर में आयोजित एक सरकारी प्रदर्शनी के एक स्टाल में बड़ी भीड़ लगी थी, जिज्ञासावश में भीड़ के भीतर गया तो पता चला की शेख अब्दुला साहब, गाय देखने आए हैं, मैं तुरंत वापस लौटा और साथियों से कहा’ चलो इस स्टाल को रहने दो, भरत शर्मा ने पूछा क्या है, मैंने कहा- जर्सी गाय हैं. कश्मीर के किसी विभागीय अधिकारी ने ये सुन लिया, मुझे पूछा आप लोग कहाँ से आए हैं. मैंने कहा- मध्यप्रदेश  के बिलासपुर से, वो बोला तभी कहा रहे हो, ‘जर्सी गाय है’, वो जानता था कि, यहाँ कोनी में जर्सी डेयरी  फार्म है.

मुझे याद है कि मंत्री द्वय अशोकराव और बी.आर यादव के सयुंक्त प्रयासों से  सकरी गाँव में पशुधन मेला आयोजित किया गया था, जहाँ देश भर का उन्नत पशुधन पंहुचा था.  रेमण्ड के श्री विजयपत सिंघानिया ने गोपालनगर में सीमेंट प्लांट की स्थापना के साथ आधुनिक डेयरी की स्थापना की जिसकी  थी, जिसकी देखभाल डा.श्याम झावर करते, यहाँ से गाँव तक पशुधन उन्नत के लिए नेटवर्क बुना गया. जिसका लाभ भी मिला. पर आज गाँव के पशुधन की दशा बड़ी खराब है. लगता है सरकारी कोशिशें दूर   गाँव-जंगल में पहुंचने के पहले दम तोड़ देती है. जंगल में बकरे-बकरी बाँट कर काम चलाया जा रहा,पर ये नाकाफी है, जब तक गाय की नस्ल उन्नत नहीं होती, जंगल से बाल कुपोषण दूर नहीं हो सकता.

 जिले के एक बड़े साहब ने अपने बच्चे की पहली वर्षगांठ मनाई, कुछ पत्रकारों को भी भोज पर आमंत्रित किया गया था. पर उनको भोज का कारण नहीं बताया गया था. भोज कुछ लोगों तक सीमित  था, पर बाकी गिफ्ट में कुछ न कुछ लाए थे, मैं खाली हाथ था, पर कुछ दिन मैंने उनकी श्रीमती जी को एक ‘बैगा माँ’ की फोटो लेमिनेशन करा के भेंट कि जिसमें वो साल भर के पुष्ट बच्चे को बाजू में बंधे दिखाई दे रही थी, उन्होंने मेरी भेंट स्वीकारी और पूछा कि, कौन है ये ? मैनें बताया कि ‘लमनी गाँव की सोन कुंवर है. एक दिन वो लमनी गई और बाद में मुझे बताया कि  सोना कुंवर का बेटा पहले सा तगड़ा नहीं रह गया है. जाहिर था, जब तक माँ का दूध मिला वो तगड़ा था, बाद खुराक की कमी के कारण वो कुपोषित होने लगा. पिछले दिनों में लमनी गया तो पता लगा सोन कुवर गाँव के दूसरे कोने में खेती के कारण रहने चली गई है.

 पशुधन को उन्नत बनाने जो काम किया गया वो अंजोरा और कुछ निजी डेयरी में सिमटा है, ये विकास के टापू हैं और बाकी अभाव का समुंद्र, बुरी दशा दूर जंगल के इलाके में है. यहाँ छोटी देसी गाय चार माह दूध दे तो बड़ी बात. एक लोटे में गाय को दूह लिया जाता है, गर्मी में सूखा और बारिश में फसल के कारण चराई पर रोक, खुद की माली दशा ठीक नहीं, तो भला पशुपालक गाय को भरपेट पौष्टिक दाना कहा से दें.


छोटे-छोटे बैल बारिश के शुरुवाती दिनों में नागर खींचते दिखाई देते हैं. कुछ कमजोरी के कारण खेत में थक कर बैठ जाते हैं. कृत्रिम रेतन का प्रयोग सकारात्मक रहा, पर कागजी आंकड़ों के खेल का अंजाम भी दिख रहा है. दूर वन्यगाँवों  में ये नेटवर्क काम किया हो ये वहां की गाय से नहीं लगता. 
गाँव-गावं में परिवहन के आधुनिक संसाधन आ चुके है. शानदार सफेद बैल और उनकी बैलगाड़ी का युग खत्म हो गया. सरकारी प्रदर्शनी में पशुधन जैसा दिखता है, वैसा गाँव में कहीं नहीं, छतीसगढ़ के गांवों में छोटे-छोटे बैल हैं, कभी बैल किसान के भाई माने जाते पर जोताई-मिसाई के आधुनिक साधनों की वजह उनकी उपयोगिता कम हो गई, कदाचित इसलिए उन पर ध्यान भी कम होता जा रहा है. 

अब तो बस ‘पोरा’ के ‘तिहार’  के पर  दिन पूजा ज़रूर होती है. डेयरी के लिए महाराष्ट्र के बाजार से उन्नत नस्ल की गाय मोल लाई जाती हैं. 15-17 लीटर दूध देने वाली गाय पचास हजार की. गुजरात,हरियाण से गाय की खरीदी होती है,पता चला ही कि पंजाब ने अन्य प्रान्तों को गौ निर्यात पर रोक लगा दी है. यदि वन इलाकों में जन स्वास्थ की ईमानदार कोशिश करनी है और गाँव और जंगल में बच्चों को कुपोषण से बचाना है तो वहाँ हर घर गाय का दूध उपलब्ध हो ये प्रयास जरूरी है..! ‘वरना कुपोषण भारत छोड़ो’ महज नारा बन कर रहे जायेगा.जब गाऊ माँ ही कुपोषित होगी दूध कम दिन व थोड़ा देगी तो वनपुत्रों को कुपोषित होने से भला कैसे बचाया जा सकता है.[फोटो और लेख -प्राण चड्ढा]

Thursday, 27 June 2013

भारत से चीता यूँ हुआ ख़त्म .


धरती का सबसे तेज धावक व शिकारी चीता [cheeth] कभी भारत में था. अंतिम तीन चीते छतीसगढ़ की कोरिया रियासत 1948 के आसपास मारे गए.. फिर कभी भारत मैं चीता नहीं दिखा.अब वो ईरान और अफ्रीका में ही शेष है.
बिल्ली की ३६ प्रजातियों मैं चीता भी शामिल है.समान्यता तेंदुए को ही चीता मान लिया जाता है, पर काले धब्बे में अंतर और चीते की आंख के जबड़े तक दोनों तरफ काली लकीर होती है. कोरिया रियासत का तत्कालीन राजा कुशल शिकारी व प्रजापालक था . उसके राजमहल में देसी-विदेशी जानवरों की ट्राफी का आनोखा संग्रहालय आज भी देखने लायक है..बताया जाता है की रात शिकार के दौरान ये तीनों चीते साथ मारे गए थे.. तीनों नर थे,और पूरी तरह जवान भी न थे, तब माना गया कि , इनके माँ- बाप जीवित होंगे,पर वो कभी न दिखे.
आज जब देश में चीते को फिर से बसने की बात की जा रही है, तो कोरिया[ बैकुंठपुर] का दावा प्रबल है,क्योंकि यहाँ चीते के लिए आदर्श परस्थितियाँ मौजूदा हैं.[राहुल सिंह जी,आपने टिप्पणी में जो चूक बताई थी सुधार दी है, आभार ]

Friday, 21 June 2013

हरियर छतीसगढ़,गुजरात की भेड़ों का चरागाह




‘’हरियर छत्तीसगढ़’ गुजरात की हजारों भेड़ें का चारागाह बना हुआ है, सारे-साल ये भेड़ें मैदानी इलाके में चरती हैं और वर्षा ऋतू में बारिश से जमीन गीली होने और धान फसल  अभियान के लिए किसानों की  खेत जुताई की वजह ये चौमासा बिताने ये ‘रेवड़’ पहाड़ी जंगल की और रुख करते हैं. कोई चार दशक से मैं इनको देख रहा हूँ, जब गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी गुजरत के प्रगति का दावा कहते हैं कि, गीर के जंगल में शेर दिखने के काम महिला गाइड करती हैं, तब मैं सोचता हूँ कि, वो तो ठीक है, पर छतीसगढ़ के बाघ सहित अन्य वन्य जीवों को लिए गुजरात के रेवड़ खतरा क्यों बने हैं. यद्यपि इनमें कुछ रेवड़ राजस्थान के भी हो सकते हैं.

 यायावर जीवन व्यतीत करने वाले ये पशुपालक मुझे जंगल जाते-आते दिख ही जाते हैं, हाल में ही जो झुण्ड देखा वो काफी विशाल था. पच्चीस दे ज्यादा ऊंट, पचास से अधिक बड़े मजबूत और वफादार कुत्ते और दो हजार दे अधिक भेंड़. ऊंट पर अपने बच्चे और कुत्तों के पिल्ले, महिलाएं काले परम्परागत कपड़ों में और पुरुष सफ़ेद कपड़ों में..! ऊंट के ऊपर ही बच्चों और पिल्लों के जो मैत्री बन जाती है, वो आजीवन बरक़रार रहती है..! कुत्ते भेड़ों को हिंसक वन्य जीवों से बचाते है, चोर की क्या मजाल जो रेवड़ के करीब भी पहुँच जाए. पिल्ले भेड़ों का दूध पर पलते हैं, और फिर मानो वे दूध का कर्ज अदा करने उनको चराते हैं, कोई भेड़ रेवड़ से अलग हो जाए तो घेर कर वापस ले आते हैं. भेड़ों के साथ ऊंट मालवाहक का काम करते हैं,बच्चे,बीमार,तम्बू, पिल्ले अथवा भेड़ के मेमने भी ऊंट के ऊपर होदे में सफर करते हैं, भेड़ें नीचे तो ऊंट पेड़ों से चारा पा जाते हैं. जिधर ये काफिला गुजरा सारा चारा सफाचट .

कभी वो दौर था जब खेत में रात भेड़ बैठाने के लिए ये रेवड़ वाले पशुपालक किसानों से पैसा लिए करते थे, किसान भेड़ों के मल-मूत्र को खाद मानते, ये जैविक खाद तबतक प्रचलित रहा, जबतक यूरिया,पोटाश, और सुपरफास्फेट जैसे खाद प्रचलित न थे, मगर आज ये अवधारण बदल चुकी है, अब माना जाता है कि, भेड़ें जो खरपतवार के बीज खाती हैं, वे भी उनके पेट से हो कर खेत में पहुँच कर उग जाता है, जिसे फिर खेतों से इसको  नष्ट करना बड़ी समस्या बन जाता है. इसलिए किसानों की नजर में यह उपयोगिता और भेड़ पलकों को इससे मिलने वाली आय जाती रही.

रेवड़ वालों की आय के स्रोतों में कोई  कमी नहीं, भेड़ का दूध, उससे बना घी, साल में दो बार मिलने वाला बेशकीमती ऊन, उनकी आय का मुख्य स्रोत है. इसके अलावा भेड़ों की बिक्री भी वे करते है, ये सब छतीसगढ़ की हरी-भरी भूमि पर मुफ्त चराई का नतीजा है , बताया जाता है कि, वन विभाग ने चराई शुल्क का प्रावधान है .पर इन भेड़ों की होने वाली बीमारी वन्यजीवों को न हो इस ‘संरक्षण’ के चलते जोर नहीं दिया गया. लेकिन इससे भला क्या होता है. अब ये काम वन विभाग की निचले कर्मियों की ‘सेटिंग’ से हो जाता है. मगर ईमानदार वनकर्मी इनको अपने जंगल में फटकने नहीं देते..! उनका मानना ही कि भेड़ें जिससे चरती है वो फिर नहीं पनपता, क्योंकि वे उनमें नीचे से चरने में सक्षम होती हैं, जिस वजह फिर कांसे फिर नहीं फूटते.

भेड़ पालकों का चराई क्षेत्र में मेलक रेंज के निचला हिस्सा आता है. वैसे ये हर नक्सल प्रभावित इलाके को छोड़ कर पूरे छतीसगढ़ के पहाड़ी और मैदानी इलाके मैं यायावरी जीवन बिताते हैं. उधर मोदीजी जब दिल्ली में गुजरात के समग्र विकास का ढ़ोल पिटते है तब मुझे लगता है कि वे इस यायावरी पशुपालन के युग से अवगत क्या वे नहीं हैं ? क्या रेवड़ ले कर छतीसगढ़ में भटक रहे गुजरात के इनकी प्रगति के बिना गुजरात की समुचित तरक्की मानी जा सकती है. कुछ वापस गुजरात चले जाते हैं तो दूसरे छतीसगढ़ पहुँच जाते हैं, मीलों दूर भटकन का जीवन,दुनिया आगे निकलती जा रही है.
          
 उधर वन विभाग के आलवा ये पुलिस विभाग के निशाने पर भी रहते है, पर पैसे और इनकी लाबी की ऊँची पहुँच इसको बचाए चलती है. इनको ये जानकारी रहती है की कहाँ किस मौसम में पानी मिलेगा और कहाँ चारा, जब संचार के संसाधन न थे तब भी ये रेवड़ वाले एक दूसरे की स्थिति के बारे में जानते थे और ठीक समय पर मिल जाते थे. आज मोबाइल से सम्पर्क का ये काम करते है. कोई पच्चीस साल पहले अचानकमार इंचार्ज एम् आर ठाकरे, पत्रकार अमित मिश्रा और मैं सुदूर गाँव ‘छिरहाता’ जा रहे तब किसी रेवड़ से बिछड़ गई दो भेड़ें रह में मृतप्राय: मिलीं, गाँव में ले जाकर पानी पिलाया तो होश आया. पर ऐसा कम होता है.

मोदी जी, अब ये बदलाव चाहते हैं.

जंगल में भेड़ पालने और यायावरी जीवन व्यतीत करने वाले इस जीवन से मुक्ति चाहते हैं. नर्मदा नदी की उदगम स्थली अमरकंटक में कल्याण सेवा आश्रम ने सन 1998 में विशाल आश्रम स्कूल की स्थापना की, तब ये कच्छ और भुज के ये लोग बाबा कल्याणदास से मिले और कहा- हम चाहते हैं हमारे बच्चे पढ़ लिख कर जीवन बदले, कल्याण बाबा ने उनको हिमाद्री मुनि से मिलाने को कहा कि, वे आश्रम स्कूल का कार्य देखते है. पहले पांच बच्चों ने नर्सरी में प्रवेश लिया फिर कुल चालीस बच्चे इस स्कूल में आ गए, आज सभी ने सीबीएससी के बारहवीं तक पढ़ाई पूरी कर ली हैं, और अब गुजरात में उच्च शिक्षा ले रहे हैं, हिमान्द्री मुनि ने बताया कि पढने के अलावा वे खेल में भी प्रवीण निकले ,पांच छात्र तो नेशनल तक खेल में पहुंचे..! अब कभी बाबा कल्याण दास किसी आयोजन में गुजरात जाते हैं तो युवा हो गए ये छात्र उनसे मिलाने भी पहुँच जाते है.     

Friday, 14 June 2013

बरसो रे कारे बदरा, बरसो रे





महाकवि कालिदास के विरही यक्ष का संदेश ले जाने वाले मेघ तेरा स्वागत है, तेरे स्वागत में साल के घने वनों में हरी चादर ओढ़ ली है. जिस भांति मछली जल बिन नहीं रह सकती, वही दशा चातक की बनी है, तेरे आसरे खेती करने वाले किसान तुझे धरासार बरसते देखना चाहते हैं, जिससे पानी का खेती में कम न हो.

कोयल ने कुहु अब बंद है, वो जानती है कि अब जब बरसाती मेढ़क शोर करने लगे हैं. तो उसकी कौन सुनेगा. पर मैं जानता हूँ कि, मीठा गाने वाली कोयल ने कौवा को उल्लू बना दिया है और उसके घोंसले में अपने अंडे दे दिए हैं, अब कौवा दम्पति पाले कोयल के बच्चे. इसलिए मैं मीठा बोलने वालों से ‘तीन-तौबा’ करता हूं. जंगल में घने साल के पेड़ अमरकंटक की घाटी में छाए हैं, इस घाटी में बारिश कुछ पहले शुरू हो जाती है और उसके साथ झींगुर गाने लगते हैं,  ये उनके मिलन का संगीत. एक साथ करोड़ो झींगुर का ये ‘चिचिची’ का शोर भरा संगीत, टाइगर  वेली की सड़क के दोनों तरफ जंगल को जीवंत बनाए रखता है.

बगुला-भगत मानसून से पहले रंग बदलता है. सफ़ेद बगुले के सर से पीठ तक पीले पर निकल आते है, प्रजननकाल में उनका रूप बदल के सुंदर हो जाता है. काले कर्मोरेंट और ये सफ़ेद बगुले रंगभेद नहीं मानते और किसी सुरक्षित पेड़ को कालोनी बना साथ-साथ चौमासा बिताते हैं. मानसून के कारण नदियाँ बहाव में होती हैं, और ऊपर चढ़ती मछलियों को ये तट से पकड़ कर घोंसले में आए नए  मेहमान का पेट भरते हैं. गरमी और वर्षाजनित नमी से परिंदों के अण्डों से बच्चे फूट निकलते हैं. पक्षी इस ऋतू में बढ़े कीट-पतंगों को पकड़ कर बच्चों का पोषण करते हैं, यदि वे ये न करते तो किसानों की लगाई फसल को न जाने कितने और कीट प्रकोप का समाना करना पड़ता.
काले घनेरे मेघ के नीचे जब बड़े सफ़ेद बगुले उड़ाते हुए तेजी से अपने आशियाने को जाते दिखाई देते है तो मैं जाना जाता हूं कि अब तेज बारिश होने वाली है.

 उड़ने वाली भूरी बत्तखें [विस्लर] जब सीटी बजाते नीची उड़ान भरतीं हैं, तब  मानते हूं कि ये अंडे देने कहीं जगह खोज रहीं हैं. काली मैना बिजली के खम्बों में घोंसले बनाती हैं तो मैं हैरत में होता हूँ इसे कैसे पता चला कि मेघ आने वाले है. मेगपाई रॉबिन और बुलबुल जब मधुर गाने गाती हैं  तब लगता है मेघों के बरसने से पहले ही वो ख़ुशी के गीत गा रही है. महोक की जुगलबंदी का कोई सानी नहीं, जब में पीसी में लिख रहा हूँ कोई कथायी महोक जोड़ा दूर बैठा एक दूजे से बात कर रहा है.चीटियाँ अंडा ले कर ऊपरी स्थान को निकल पड़े तो मानो बरखा भरपूर. न जाते ये जीव कैसे जाने जाते है की मेघ तुम आ रहे हो.

किंगफिशर की तो बात निराली है, लम्बी चोंच इसका हथियार है, जितना सुंदर रंग मछली पड़ने   उतना ही हुनरबाज ये परिंदा, गोताखोरी कर मछली पकड़ने में माहिर. मैं जब अमरकंटक जाता हूं तो माँ नर्मदा के उदगमस्थली के कुंड में छोटे किंगफिशर को गोताखोरी कर मछली पकड़ते देखता हूं. वो कुंड के पास किसी मन्दिर पर चुपके से बैठा होता है. गरमी खत्म नहीं होती कि किंगफिशर तेज लम्बी गुहार लगता है बरसात के लिए, कदाचित वो जानता है, बारिश न हुई तो नदी-जलाशय में मछलियाँ कहाँ सा आएगी ..मोर तो बादल देख छम-छम कर नाच उठता है. उसकी केका ध्वनि दूर तक समां बांध देती है. जेकाना [जल मोर] और शोर मचाने वाली जलमुर्गी दूर खेतों तक पहुँच जातीं हैं. नदियाँ,नाले,तालाब, खेत सब प्यासे हैं. काले बदरा इनकी प्यास बुझा.

हे काले मेध, तू मित्र बनके आ और जो तेरी प्रतीक्षा करते हैं, उनकी मन की प्यास पूरी तरह बुझा. कालिदास के मेघदूत, जिसका दूत तू बना, वो तो सर्वांग सुन्दरी पत्नी से दूर विरह कट रहा था पर ये सब तो तेरी विरह में हर साल आठ-नौ माह गुजरते हैं..अब आया है, तो ‘चातुर्मास’ इनके साथ बिताना.
[पहली फोटो जंगल की मेरी ,शेष गूगल से साभार-प्राण चड्ढा ]     .

Wednesday, 29 May 2013

बाघ गणना में गए और भटक गए



  .
बाघ की गणना जान का जोखिम है, ये नहीं कि जंगल में बाघ हमला कर देगा, अपितु घने जंगल राह भटक सकते हैं. पांच साल पहले बाघों की गणना उसके दरी पगचिन्ह देख कर की जाती थी तब न तो जीपीएस का उपयोग होता था और न ही कैमरे से बाघ की फोटो की तकनीक की वैज्ञानिक पद्धति ही विकसित हुई थी . हाँ, वनविभाग बाघों की गणना में ‘नेचर’ से जुड़ी संस्थाओं की मदद लेता ज़रूर रहा .
वो मई के शुरुवाती दिन थे इसलिए मैं सुबह अचानकमार सेंचुरी के सरहदी इलाके में सिहावल सागर सुबह-सुबह इस गणना में  पहुँच गया था, इस जलाशय से मनियारी नदी निकलती है. मेरे साथ पत्रकार दिनेश ठक्कर और शरद पाण्डेय थे. इस जलाशय में मगर हैं . घने साल वन के बीच इस सुंदर जलाशय में संध्या होने के पहले आज भी बायसन का झुण्ड पानी पीने पहुँच जाता है. मेरा अनुमान था कि, जलाशय के किनारे कीचड़ में बाघ के पदचिन्ह जरूर मिलेंगे. अभी ये सोच ही रहे थे की मेरा जांबाज दोस्त अर्जुन भोजवानी पहुंचा. वो कुछ उत्तेजित लग रहा रहा था.मैंने पूछा तब उसने बताया कि बाघ के पदचिन्ह खोजते हुए ऐसी जगह पहुँच गया जहाँ अवैध लकड़ी कटाई हो रही थी, मना करने पर लकड़ी काटने वालों ने हमला दिया, जान बचाने पिस्टल से तीन गोली चलानी पड़ी है .

  हम सबने तय किया चलो कटाई करने वालों को सबक सिखाया जाए .इस इलाके में पिछले साल बाघों की गणना के लिए मैं  पीसीसीएफ [वन्यप्राणी] के था जिप्सी से आया था तभी राह में एक दर्जन ग्रामीणों ने सड़क पार की, सबके कंधे पर कुल्हाड़ा था. मैंने साथ सफर कर रहे वनकर्मियों से उनको रोकने के लिए कहा और पूछा- ये कुल्हाड़ी क्यों ..? जवाब मिला जंगल में रक्षा के लिए. मैंने फिर पूछा, सबके पास और भारी लकड़ी कटाने वाली ही क्यों..? अब वो भागने लगे. पीछे के गाड़ी से दो-वन कर्मी उनको खदेड़ने थोड़ी दूर गया फिर वापस आ गए. शायद वे  जानते थे आगे जान खतरे में पढ़ जाएगी .मुझे बीते साल की ये घटना याद आ गई. बहरहाल दो जीपों में हम लोग रवाना हुए.

करीब जीपें दो किलो मीटर बाद रुक गई आगे की राह दुर्गम थी और चढ़ाई पैदल तय करनी थी. कुछ दूर जाने के बाद दिनेश ठक्कर और डा.मोटवानी ने कहा हम जीप के लिए वापस जा रहे है वहां इंतजार करेंगे . बीटगार्ड साहू ,अर्जुन भोजवानी ,शरद पाण्डेय और मैं आगे बढ़ गये. तीन किलोमीटर के बाद भी कोई न दिखा और न पेड़ कटे मिले..न कटाई की आवाज ,पर अर्जुन के कहने से आगे बढ़े जा रहे थे .आखिर मैंने कहा- अर्जुन हम जंगल में  जितनी दूर आ गए हैं वहाँ से तो वापस जाना ही मुमकिन नहीं लगता. सबको बात सही लगी और फिर जारी हुआ वापसी के लिए जद्दोजहद का सिलसिला ,कभी सूरज को आधार मान के आगे बढ़ाते तो कभी नाले-नाले चले जाते तो किसी पगडण्डी पर चलने लगते .पानी की एक बोतल थी. वो भी धीरे-धीरे ख़त्म हो गई. भूख लगाने लगी तो तेंदू के कुछ फल गिरे मिले कुछ तोड़े पर ये ऊंट के मुंह में जीरा सा था 

..कभी खाई फिर पहाड़ दर पहाड़  पग-पग तय करते गए. साथ गया बीट गार्ड नया था, जब राह न मिलती तो हम अपनी हताशा उस पर उतारते तो वो बोलता ‘भाई मरना है तो मार लो’ मैं भी ये जगह नहीं जानता’’ .. तय हुआ ऊँचे पहाड़ से किसी गाँव को देखें ..दोपहर ढलने लगी पर सूरज तप रहा था. किसी तरह पहाड़ पर चढ़ गए ,पर कोई गाँव दूर-दूर तक नजर नहीं आया. लेकिन मोबाइल पर हल्का सा कवरेज़ दिखा ..जंगल में मदद की लिए किसी को मोबाईल पर बात करना संभव न था लिहाजा बिलासपुर में अपने भटक जाने की खबर वन विभाग को दी और संभावित जगह बताई जहाँ हम लोग होंगे.

वन विभाग ने वायरलेस मेसेज अचानकमार में मौजूद आधिकरिओं को दिया और दो- तीन गाड़ियाँ हमें खोजने निकलीं. हम भी प्यासे चले जा रहे थे ,राह में एक नाले में जगह-जगह रुका थोड़ा पानी दिखा,पत्तों का दोना बना पानी पिया,खाली बोतल भी इसी पानी से भर ली. फिर मैं पानी पीने झुका और शर्ट की जब में रखा मोबाइल पानी में गिर गया. गंदले पानी से खोज कर निकला पर वो बंद हो चुका था. इसी नाले पर आगे बढ़ाते रहे, बाघ के पदचिन्ह खोजना भूल चुके थे. मेरे जूते का सोल उखड़ गया था .कुछ देर ठंडी छांव में बैठ ताकत बंटोर चलाते रहे.

शाम हो चली चली थी, तभी किस्मत से  कालेज का एक छात्र नाले में वनकर्मी के साथ दिखा जो बाघ के पदचिन्ह खोजने आया था. वन कर्मी अनुभवी था. उसे जंगल की राहों का पता था. वो हमें सड़क की और ले आया..वो न मिलाता तो न जाने क्या होता. कुछ देर बाद हमें खोजने निकला दल भी इस राह से गुजरा उसने पस्त हो गये हमें पानी और कुछ खाने का सामना दिया. जान बची और लाखों पाए...! हम सिहावल सागर से मीलों दूर निकल चुके थे..बाद छपरवा पहुंचे जहाँ हमारी प्रतीक्षा हो रही थी..!
 एक बात और जंगल में कोई वन्य जीव तो न दिखा पर, ये भटकाव यादगार बन गया. रेस्ट हॉउस में मैंने एक वन अधिकारी वनकर्मी को डांट रहा था. ‘’साले तुम लोग पहले गाँवों  में जा कर क्यों नहीं बताते कि बाघों के गणना होगी लकड़ी काटने जंगल मत आना ..!” 

Wednesday, 24 April 2013

आदमखोर बाघनी का रेंज अफसर खोखर ने किया शिकार


अचानकमार टाइगर रिजर्व में अचानकमार-विन्दावल गाँव के बीच सड़क के किनारे इस स्मारक में लिखा है.-यहाँ मैकू गोंड़ फायरवाचर को आदमखोर शेरनी [बाघनी] ने 10-4-1949 को मारा था,जिसे तारीख 13-4-49 को एम् डब्लू के खोखर रेंज अफसर कोटा ने 'मरी' पर बैठ के गोली से मारा...आज भी ये इलाका बाघ का है. पर इन दोनों गाँव में बहुतेरों को बाघनी के मैकू को मरने और फिर उसे खोखर साहब द्वारा मचान से गोली मरे जाने की कहानी आज भी जुबानी है.
 शिकार की इस दास्ताँ को शिकारी वहीद खान खोखर ने अपने अन्य अनुभव के साथ किताब में लिखा था. जिस अविकल मेरे पत्रकार मित्र राजू तिवारी ने अपने प्रकाशन में नया कलेवर दिया है. कुछ माह पहले मैं मित्र डा.चन्द्रशेखर राहालकर,और लखनऊ ने आये लेखक मोहन सर के साथ विन्दावल गाँव पहुंचा था. इस बाघनी के विषय में बताया गया कि उसके खौफ से गाँव में रहना कठिन हो चला था.ये इलाका बिलासपुर से अमरकंटक की सड़क पर पड़ता है.

बाघनी दवारा मैकू का शिकार –-> उन दिनों आदमखोर बाघनी एक के बाद एक आदमी मार रही थी.फायर वाचर मैकू  अपने फायरवाचर साथी परसादी के साथ सड़क के किनारे सूखे पत्ते हटा रहा था.बाघनी करीब दीमक की  बाम्बी [छोटे से टीले ] के पीछे घात लगा कर छिपी थी. उसने परसादी के सिर के ऊपर  से छलांग लगाते हुए मैकू को गर्दन से पकड़ कर एक झटके में  ही गर्दन तोड़ दी,फिर वो परसादी पर झपटी लेकिन वो कुछ  दूर निकल गया था ,.वापस आकर बाघनी ने मैकू! को घसीट कर जंगल में ले गई .

बाघनी का रेंज अफसर दवारा शिकार--->रेंज अफसर वहीद खान खोखर को जब ये पता चला तो वो पांच सौ बोर की राइफल  और बारह बोर की गन के कर कोटा से मौके पर  पहुंचे.लेकिन बाघनी को मारने की योजना जो बनाई जाती वो कामयाब न होती,खौफजदा हो कर एक स्थनीय शिकारी भी साथ छोडकर चला गया. तब मैकू की काफी खाई लाश को पेड़ से बांध कर [ताकि बाघनी खींच कर न ले जा सके] करीब के पेड़ पर मचान बनाया गया .उनके साथ धनुआ पनका पैसे व इनाम के प्रलोभन लिय  मचान में बैठ गया. मचान. मचान 18 फिट की ऊंचाई पर बंधी गई थी , बाघनी मैकू की बची लाश को खाने दबे पाँव आई. कुछ लम्हे बाद मचान से रौशनी के साथ गोली चली और घायल हो के  बाघनी जंगल भाग निकली .सुबह होने पर कुछ दूर ही  झाड़ियों में वह  मरी हुई मिली ,उसे मरा देख  वनवासियों में जश्न मनाया. ये बाघनी और भी लोगों को अपना शिकार बना चुकी थी.

आदमखोर होने का कारण—>बाघनी के अगले पंजे में कभी गोली लगी थी ,घाव तो भर गया था पर इस  वजह वो फुर्तीले जंगली जानवर पकड़ने में असमर्थ हो गई परन्तु  मनुष्य  सहज पकड़ने की वजह आदमखोर हो गई थी .इस शिकार के बाद खोखर को पुरस्कृत किया गया और इस स्मारक को बनाये जाने की अनुमति दी गई.
फेक्ट फ़ाइल्-->
1. मैकू हट्टा-कट्टा ,अविवाहित जवान था. शिकार के बाद बाघनी एक से अधिक बार उसे खाने आई.
2. कुछ बाघों का शिकार कर चुके गवारु पंडित की हिम्मत जबाव दे गई थी और उसने इसके शिकार में खोखर साहब का साथ देने से इंकार कर दिया था.
3.गोली पांच सौ बोर की राइफल से चलाई गई थी. इस बघानी को पहले कभी एलजी का छर्रा अगले  पंजे में लगा था .घाव तो भर गया था,पर ये पैर कमजोर हो गया था.
4. बघानी 9 फिट लम्बी थी..बाघ को पूंछ से नाक तक की लम्बाई में नापा जाता है.