Thursday, 2 February 2017

सुंदर वन की फोटो ..

27 जiनवरी से 29 जनवरी 2017 . सुंदरवन की यात्रा, दोस्तों के साथ की , कुछ यादगार लम्हे इन फोटो में हैं-









































सुंदरवन कोलकता से 120 किमी, रेल मार्ग केनिग तक, कुल आईलेंड 57, बड़ा है, गोसाबा, फिर झारखली, राईजिगी, सतजेलिन, ये  चार द्वीप  टूरिस्ट के प्रवेश द्वारा, नेट नहीं, बिजली पानी,दूध नहीं, करीब पचास आईलेंड में बसाहट नहीं ,गरीबी, चावल श्तेश्वर, बासमती के कारण खत्म हो रहा है, टूर संयोजक रहे ललित शर्मा, गाईड बासु दा, रुके झारखली, सोमनाथ दा के होम स्टे  मेंग्रोव्  रिसार्ट में ..

Thursday, 22 December 2016

कान्हा में रात्रि भ्रमण,संरक्षण विरुद्ध

दिन की छोड़ों अब वन्यजीवों को रात भी खलल पहुंचाया जाएगा, इसकी शुरुवात मुझे कान्हा नेशनल पार्क से दिख रही है। जब मैँ मध्यप्रदेश के वाइल्ड लाइफ बोर्ड में मेम्बर था, तब एलीफेंट से टाइगर शो बन्द कराया गया, लेकिन पर्यटन लाबी ने काफी जोर लगाया। तब यहां फिल्ड डायरेक्टर राजेश गोपाल जी रहे। बहरहाल वो बन्द है।
अब कान्हा,अक्टूबर में एक माह पहले खुल जाता है। जबकि क्लाइमेट, कान्हा और अचानकमार का कोई अलग नहीं।
कान्हा मे टाइगर का स्वभाव बदल रहा है। वन्यजीव को आदमी को देख भागना चाहिए या हमला करना चाहिए। पर ये फ्रेंडली हो गया है। मानव की उपस्थति का कोई नोटिस वो नहीं लेता। दिन रात जिप्सी सफारी और आदमी देख वह् बड़ा होता है। साल के पेड़ मुक्की रेज में मर रहे हैं, बोरर बढ़ रहा है। ये कुदरत के साथ इसी खिलवाड का नतीजा है। अचानकमार में ये सब नहीं, साल का जंगल अधिक बेहतर है।
कान्हा में दो गेट थे अब तीन है। अब रात को भी जंगल में घूमिये बस रूपये लगेंगे। क्या रूपये की खारित टाइगर और निशाचर वन्यजीवों के जीवन में खलल वन्यजीवन संरक्षण की भावना के प्रतिकूल नहीं ? इस सम्बन्ध में एमके रणजीत सिंह साहब, बिट्टू सहगल, वाल्मीकि थापर, बिलिंडा राइटस से जानकार लोगों की राय अहमियत रखती है। मुझे यकीन है की वो इस कृत्य को,कंभी उचित नहीं मानेगें।
पर्यटन जंगल में हो मगर, किन शर्तों पर,इस और धंधेबाज़ संस्थाओं के दोहन के बजाय संरक्षणवादियों की राय को महत्व मिले। इस मामले में केंद्रीय मंत्रालय, और माननीय सुप्रीम कोर्ट को पहल कर नए सिरे से गाइड लाइन जारी करनी होगी।। नहीं तो जंगल के और ज़ू के टाइगर में मौलिक अंतर खत्म हों जायेगा।
अगर पर्यटकों को रात पेट्रोलिंग के नाम पर जंगल के बफर जोन में भी ले जाया जाता है, तो वहां कोर जोन के टाइगर, और वन्य जीव ही होतो हैं, उनको नक्शे में खींची लकीरों का कोई ज्ञान नहीं होता। जू भी रात बन्द होते है और ये तो नेशनल पार्क है, जिसके टाइगर अचानकमार टाइगर रिजर्व तक आते हैं।

Thursday, 15 December 2016

मधुमक्खी का छत्ता खाने वाला बाज





तीसरे दिन मेहनत  की रंग लॉई और 0rientel Haney- Buzzard को मधुमक्खी के छत्ते से शहद खाते कैमरे में कैद कर लिया गया ( कल का फॉलो अप)
आज सुबह Rahul SinghSanjay SharmaApurv Sisodia,के साथ बिलासपुर से रवाना हुए और अरपा नदी में सुर्खाब की फोटो लेने के बाद मौके पर पहुंचे।ये जगह थी, बिलासपुर- कोटा सड़क मार्ग में मोहन भाटा के बजरंग केडिया जी का आम का बगीचा, बस फार्म हॉउस के सामने युकिलिप्ट्स के ऊँचे पेड़ पर  एक बाज मधुमक्खी का छत्ता खाते मिला ही गया ।ये दुर्लभ मंजर था, इस छते को मघुमक्खी छोड़ कर उड़ चुकीं थी।दूसरा आसमान में ऊपर चक्कर लगा रहा था। हम सबने खूब फोटो ली। यह देखा गया कि बाज, छत्ते के मोम सहित शहद खा रहा था। उसने गले तक बेख़ौफ़ खाया,और विजेता की भांति डाल पर तन कर चलता हल्की उड़ान भर करीब उस डाल के पास जा बैठा, जहां नए छत्ते में, मघुमक्खी बैठी थीं।

Thursday, 20 October 2016

कान्हा टाइगर रिजर्व में साल बोरर






देश के विख्यात नेशनल पार्क कान्हा में साल बोरर का प्रकोप ऊंचे साल के पेड़ों को सुखा रहा है. दो दशक पहले साल बोरर के अटैक ने अरबों रुपयों के पेड़ों को काटने के लिए मजबूर कर दिया था. ये पेड़ इसलिए काटे गए थे, की बोरर और न पनपे और पेड़ों के साथ नष्ट हो जाए.
कान्हा टाइगर रिजर्व के पार्क का बड़ा एरिया सैलानियों की गतिविधियों से दूर रखा गया है, ताकि वन्य जीव कोलाहल से मुक्त रहे. फिर भी जो क्षेत्र खुला हैं उसमे सूखे साल वृक्षों की भरमार हो चुकी है. ये हरियाली की मखमल पर टाट का पैबंद है. अधिकाँश वृक्ष बीते साल के सूखे हो सकते हैं. लेकिन ऐसे वृक्ष भी कम नहीं जिनमे साल वृक्ष से निकाला गया इन बोरर कीड़ों के द्वारा निकाला गया पावडर इन वृक्षों के नीचे ढेर लग रहा है.{पहली फोटो में}
साल यानी सराई छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष है. ये सदाबहार है. यानी इसमें पतझड़ कब हुआ पता नहीं लगता. साल के जंगल में ठंडक और नमी बनी रहती है. साल के बारे में यह माना जाता है, कि यह सौ साल में बड़ा होता है और सौ साल तक खड़ा रहता है और सौ साल तक इसकी लकड़ी ख़राब नहीं होती. इसकी मजबूती के कारण रेलवे के स्लीपर साल वृक्ष से बनते रहे हैं, लेकिन इतना मजबूत पेड़ काले रंग के एक छोटे से कीड़े का शिकार हो कर सूख रहे हैं..! 
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. यदि इसी अवधारणा पर चला जाएगा तो आगे भी साल बोरर पेड़ों का खात्मा न किया गया तो नियम क़ानून का पालन करने वाले इसके चलते कुछ न कर पायेंगे और साल बोरर कान्हा को वीरान उजाड़ करता रहेगा. छत्तीसगढ़ राज्योदय के पहले कान्हा के फील्ड डायरेक्टर राजेश गोपाल ने साल बोरर पर काफी काम किया था और फिल्म बनाई थी. उनके अनुभव का लाभ कान्हा में आयी इस विपत्ति का निराकरण कर सकता है. क्योकि ऐसा लगता है कि खतरे की निर्धारित संख्या से अधिक साल के वृक्ष सूखते दिखाई दे रहे हैं.

कान्हा टाइगर रिजर्व में साल बोरर






देश के विख्यात नेशनल पार्क कान्हा में साल बोरर का प्रकोप ऊंचे साल के पेड़ों को सुखा रहा है. दो दशक पहले साल बोरर के अटैक ने अरबों रुपयों के पेड़ों को काटने के लिए मजबूर कर दिया था. ये पेड़ इसलिए काटे गए थे, की बोरर और न पनपे और पेड़ों के साथ नष्ट हो जाए.
कान्हा टाइगर रिजर्व के पार्क का बड़ा एरिया सैलानियों की गतिविधियों से दूर रखा गया है, ताकि वन्य जीव कोलाहल से मुक्त रहे. फिर भी जो क्षेत्र खुला हैं उसमे सूखे साल वृक्षों की भरमार हो चुकी है. ये हरियाली की मखमल पर टाट का पैबंद है. अधिकाँश वृक्ष बीते साल के सूखे हो सकते हैं. लेकिन ऐसे वृक्ष भी कम नहीं जिनमे साल वृक्ष से निकाला गया इन बोरर कीड़ों के द्वारा निकाला गया पावडर इन वृक्षों के नीचे ढेर लग रहा है.{पहली फोटो में}
साल यानी सराई छत्तीसगढ़ का राजकीय वृक्ष है. ये सदाबहार है. यानी इसमें पतझड़ कब हुआ पता नहीं लगता. साल के जंगल में ठंडक और नमी बनी रहती है. साल के बारे में यह माना जाता है, कि यह सौ साल में बड़ा होता है और सौ साल तक खड़ा रहता है और सौ साल तक इसकी लकड़ी ख़राब नहीं होती. इसकी मजबूती के कारण रेलवे के स्लीपर साल वृक्ष से बनते रहे हैं, लेकिन इतना मजबूत पेड़ काले रंग के एक छोटे से कीड़े का शिकार हो कर सूख रहे हैं..! 
कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. यदि इसी अवधारणा पर चला जाएगा तो आगे भी साल बोरर पेड़ों का खात्मा न किया गया तो नियम क़ानून का पालन करने वाले इसके चलते कुछ न कर पायेंगे और साल बोरर कान्हा को वीरान उजाड़ करता रहेगा. छत्तीसगढ़ राज्योदय के पहले कान्हा के फील्ड डायरेक्टर राजेश गोपाल ने साल बोरर पर काफी काम किया था और फिल्म बनाई थी. उनके अनुभव का लाभ कान्हा में आयी इस विपत्ति का निराकरण कर सकता है. क्योकि ऐसा लगता है कि खतरे की निर्धारित संख्या से अधिक साल के वृक्ष सूखते दिखाई दे रहे हैं.

Saturday, 30 July 2016

वाइट टाइगर की जंगल वापसी कब .!


क्या वाइट टाइगर की दहाड़ जंगल में फिर कभी गूंजेगी। जवाब है हाँ बस इस और कदम बढ़ चुके हैं और बस एक कदम की दूरी है। विश्व के 70 फीसद बाघ भारत में हैं। इनकी संख्या 4 हजार के करीब ही बची है।
वाइट टाइगर इन्ही टाइगर से अलग नहीं बस जीन्स की करामात से रंग बदल गया है। आज जितने भी वाइट टाइगर हैं वो रीवा महाराज मार्तंड सिंह के द्वारा जंगल से पकड़े गए एक वाइट टाइगर की सन्तान हैं।उन्होंने शिकार के दौरान एक सफेद शावक माँ के साथ देखा और बाद उसे पकड़ने में सफलता हासिल की। इसका नाम मोहन रखा गया। बाद मोहन की ब्रीडिंग सामान्य बाघिन से करायी। दो जनरेशन बाद सफेद शावक का जन्म हुआ।
आज मध्यप्रदेश में मुकुंदपुर में वाइट टाइगर सफ़ारी शुरू हो गयी है।
अगला कदम ये करना होगा, वाइट टाइगर को शिकार के लिये और अपने बचाव के तरीको से अवगत करके उसकी वापसी जंगल में फिर की जाए। इसके लिए मुकंदपुर के करीब सेंचुरी की मांग की खबरें आ रही है। इस तरफ केंद्र और राज्य सरकार की पहल जरूरी है। जंगल ने विश्व को अनुपम उपहार वाइट टाइगर दिया । अब हमारी पारी है की हम जंगल को उसका वाइट टाइगर और बढ़ा कर वापस करें।
( फोटो,गूगल बाबा,और कानन पेंडारी जू के प्रभारी टी आर जायसवाल से।)

Friday, 13 May 2016

कैमरा ट्रेक में बच्चे वाली टाइग्रेस दिखी ,




अचानकमार टाइगर रिजर्व में हाल में ही एक टाइग्रेस और उसके दो शावकों की फोटो पेड़ो पर लगाये गए कैमरों ने रिकार्ड की है ,,इन फोटो में कैमरे ने फोटो लिए जाने का समय और तिथि भी दर्ज की है ,,जिसे जीवों की सुरक्षागत कारणों से क्राप कर दिया है,,मुझे ये फोटो टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर तपेश झा के निर्देश पर उपलब्ध हो सकीं,!! उनका कहना है की अचानकमार में करीब डेढ़ दर्जन बाघ है, जबकि ऐसा नहीं लगता,,! वक्त बताएगा हकीकत क्या है ,!
पर इन फोटो ,इसके साथ ये,साबित हो गया है की छतीसगढ़ के बिलासपुर-लोरमी के इस अभयवन में टाइगर परिवार का वन्यजीवों पर राज्य बना है,, श्री तपेश झा अब जगदलपुर में मुख्य वन संरक्षक नियुक्त किये गए है,,उनके स्थान पर आ रहे ओपी यादव पर अब इस टाइगर परिवार और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा का भार रहेगा,,!